Type of Vastu

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हम 7 प्रकार के वास्तु करते हैं

 

वैदिक वास्तु:-

 वैदिक  वास्तु  का  मानव  जीवन  के  उत्थान , निरोगता  और खुशहाली के लिए विशेष महत्व होता है। वैदिक वास्तु के अंदर प्लाट का चयन, धरती शोधन , नींव खनन और नीव स्थापन के मुहूर्त से लेकर , नक्शा वास्तु शास्त्र अनुसार बनाने, निर्माण की सभी प्रक्रिया शुभ मुहूर्त में करने और ग्रह प्रवेश के मुहूर्त तक सभी वैदिक प्रक्रियाओं का पालन करना होता है। पहले से निर्मित पुराने भवनों में  ग्रह प्रवेश मुहूर्त आदि का भी विशेष पालन करना होता है। इसमें भवन की उच्चाई , फर्श की ढलान  , भवन की कटान , भवन पर बाहरी वेध  , बाहरी शूल या बाहर से आने वाली सभी ऊर्जा का विशेष ध्यान रखा जाता है । उद्हारण के तौर पर जैसे भवन के बाहर , सामने या आसपास कोई शमशान घाट , धार्मिक स्थल , बड़े हॉस्पिटल, स्कूल , कॉलेज या बहुत ऊंची बिल्डिंग आदि तो नहीं या प्लाट का आकार , भवन का आकार , कोई टी-पॉइंट , बड़ा तालाब , कुआँ या कोई बड़ा पोल और  गड्ढा आदि तो नहीं।

 

 

 

डायरेक्शनल वास्तु :-

वास्तु शास्त्र के अंदर दिशाओं का विशेष महत्व है। जैसे जन्म कुंडली में दशा का महत्व होता है। इसी प्रकार वास्तु में दिशाओं का महत्व होता है। इसमें भी दसों दिशाओं पर कार्य किया जाता है। जैसे ४ मुख्या दिशा पूर्व , पश्चिम, उत्तर और दक्षिण होती है। और ४ अन्य दिशा होती है जैसे ईशान कोण , आग्नेय कोण , नैऋत्य कोण  और वाव्य कोण , नौवीं  दिशा ब्रह्म स्थान यानी स्पेस ,दसवीं दिशा पाताल। आम तौर पर सिर्फ 9 दिशाओं पर ही कार्य होता है। पर लोग पाताल दिशा पर कार्य नहीं कर पाते। अगर दसवीं दिशा पर भी कार्य हो तो वास्तु के बहुत ही अच्छे परिणाम मिलते हैं। हम दसवीं दिशा पर भी विशेष ध्यान और कार्य करते हैं। पाताल दिशा को छोड़कर बाकी धरती के ऊपर की ९ दशा ९ ग्रहों के अधीन आती हैं। अगर भवन में किसी दिशा में दोष हो तो उस भवन में रहने वाले लोगों का वह ग्रह भी पीड़ित हो जायेगा और ग्रह की दशा जब-जब आएगी तब-तब व्यक्ति के जीवन में पीड़ा देने वाली होगी और उस ग्रह से सम्बंधित मिलने वाले फलों में भी कमी आ जाएगी।

उद्हारण के तौर पर जैसे किसी के भवन के दक्षिण - पूर्व दिशा में दोष हैं तो उस घर की औरतें दुखी या रोगी रहेंगी, ग्रहस्थ जीवन अच्छा नहीं होगा, जीवन में धन की कमी होगी। सुख-समृद्धि नहीं मिल पायेगी। वाहन सुख भी उत्तम नहीं होगा और उस घर में किसी व्यक्ति विशेष की कुंडली में शुक्र ग्रह भी पीड़ित होगा तो वह व्यक्ति सबसे ज्यादा पीड़ित रहेगा। इसलिए दिशाओं को संतुलन रखना वास्तु शास्त्र का विशेष नियम होता हैं।

 

 

 

स्ट्रक्चरल वास्तु:-  वैसे तो वास्तु शास्त्र के अंदर मुख्य भूमिका भवन निर्माण की ही होती है, यानि स्ट्रक्चर बनाने का ही होता है। पर वास्तव में किसी भी स्ट्रक्चर का क्या आकार हो यानि लम्बाई - चौड़ाई या छत की उचाई क्या हो और फिर किसी भी स्ट्रक्चर की शेप कैसी हो यानि स्ट्रक्चर वर्गाकार हो, आयताकार हो, त्रिकोणीय हो, गोलाकार में हो, पंचकोण हो या षट्भुज हो तो इन सभी स्ट्रक्चरों  के आकार का अलग अलग प्रभाव उस भवन में रहने वाले व्यक्तियों पर पड़ता हैं।

फिर उससे आगे वह स्ट्रक्चर किस पदार्थ यानि किस तत्व आदि का बना है।  क्या वह मिटटी से बना है , क्या लकड़ी से बना है , क्या एल्युमीनियम का बना है , क्या कॉपर या ब्रास या कांच का बना है ,क्या लोहे का बना है या स्टील का बना है। तो उन् धातु के स्ट्रक्चर का भी भवन में रहने वाले व्यक्ति के जीवन पर अलग अलग प्रभाव आएगा।  जैसे किसी के दक्षिण - पश्चिम यानि नैऋत्य कोण में अगर कोई लकड़ी के स्ट्रक्चर बना दे तो उस घर में रहने वालों की स्तीर्था में कम हो जाएगी और पृथिवी तत्व कमज़ोर हो जायेगा और उस घर में रहने वालों का भी जीवन संघर्षमयी और बड़ी नाकामयाबी दे सकता है। इसलिए भवन का विश्लेषण करते समय स्ट्रक्चर वास्तु को संतुलित करने का विशेष महत्व है।

 

एनर्जी वास्तु ­:-

वैसे तो पूरा संसार ऊर्जा का बहुत बड़ा भण्डार है। दुनिया की हर जीव और निर्जीव वस्तु की अपनी एक ऊर्जा या औरा होती है। हर वस्तु देखने में हमें पदार्थ नज़र आती है। पर उसके भीतर ऊर्जा विशेष रूप में विद्यमान होती है। जैसे पत्थर का एक टुकड़ा हमें ठोस पदार्थ नज़र आता है। पर जब उसको तोडा जाता है यानि उसका विखंडन किया जाता है तो उसमे भी चिंगारियों के रूप में ऊर्जा निकलती है। ऐसे ही हमारा शरीर पदार्थ के रूप में नज़र आता है पर इसके भीतर भी मन और आत्मा प्राण ऊर्जा के रूप में काम करती है।

ऐसे ही हमारे भवन भी एक विशेष ऊर्जा का स्त्रोत्र होते है। जैसे जैसे हमारा भवन बनता है। तो उसमे भी कई प्रकार की ऊर्जा का निर्माण होता है। वह ऊर्जा अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी। वह ऊर्जा अलग अलग प्रकार से निर्मित होती है। उस प्लाट की मिटटी की ऊर्जा क्या है, मिटटी के नीचे किस प्रकार के पदार्थ दबे है। उसकी अपनी अच्छी - बुरी ऊर्जा होगी, निर्माण समाग्री की अपनी ऊर्जा होगी, बनाने वालों की अपनी ऊर्जा होगी, तत्वों की अपनी ऊर्जा होगी, रंगो की अपनी ऊर्जा होगी, स्ट्रक्चर की अपनी ऊर्जा होगी, फर्नीचर, उपकरणों , तसवीरें, प्रतीकों की गलत - सही कार्य विधि की अलग ऊर्जा होगी, दिशाओं, मंडल की अलग ऊर्जा होगी । अगर उस भवन पर कोई बुरी ऊर्जा आई हो तो उसकी अलग ऊर्जा होगी।

इसलिए भवन के अंदर वस्तु के अलग - अलग गुण और दोषों के अनुसार विशेष प्रकार की ऊर्जा का निर्माण होता है। वह ऊर्जा अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी और अगर उस धरती के नीचे पहले से कोई हड्डियां होगीं या भवन में किसी की मृत्यु हुई हो और उसकी गति ना हो तो भवन की शुभ ऊर्जा बिलकुल ख़तम हो जाएगी । तो अगर किसी भवन की शुभ ऊर्जा बिलकुल कमजोर होगी तो उस भवन में रहने वालों को शुभ फलों की प्राप्ति नहीं होती। दुःख, रोग, संताप और संघर्ष भी उनको घेरे रहते हैं।

आपने देखा होगा की कई बार हम किसी के घर या किसी दूसरे भवन या होटल में रहने जाते हैं। हम वहां ज्यादा रुकने के लिए गए थे पर हमें पहले ही दिन से उस भवन में रहना अच्छा नहीं लगता और हम कहते हैं कि यहाँ से जल्दी चलो। तो इसका मतलब है कि उस भवन कि शुभ ऊर्जा काफी कमज़ोर है और वह भवन हमारे शरीर से शुभ ऊर्जा खींचना शुरू कर देता है और हमें अच्छा महसूस नहीं होता।

कई बार इसके विपरीत होता है, हम कहीं गए थे एक दिन के लिए पर हमारा दिल करता है कि हम यहाँ कुछ दिन और रुक जाएँ तो इसका मतलब है कि उस भवन कि शुभ ऊर्जा बहुत अच्छी है और वह अपनी ऊर्जा हमें प्रदान करता है और हमें अच्छा महसूस होता है। इसलिए अगर किसी भी भवन में जाने के बाद आपको जीवन में संघर्ष , दुःख , रोग , कष्ट आते हैं तो उस भवन की ऊर्जा का विश्लेषण कराना बहुत जरुरी हो जाता है।

 

तत्त्व वास्तु

जैसे हमारा शरीर पांच मौलिक तत्वों से मिलकर बना है। ऐसे ही हमारे भवनों में भी पांच तत्वों की मुख्य भूमिका होती है। वह पांच तत्व हैं 1. अग्नी 2. वायु 3. जल 4.आकाश और 5 पृथ्वी । अगर हमारे शरीर में एक भी तत्व कम हो जाये तो हम रोगी हो जाते हैं। जैसे शरीर में अग्नि तत्व बढ़ या कम हो जाये तो शरीर में पित्त दोष के साथ बीमारिया उत्पन होती हैं, जैसे फोड़े-फुंसी होना ट्यूमर या कैंसर आदि होना। वायु तत्व का संतुलन बिगड़ जाये तो वात दोष सम्बन्धी रोग हो जाते हैं, जैसे पेट में गैस बनना, तेज़ाबी मादा बनना, ऑक्सीजन की कमी होना आदि। जल तत्व का संतुलन शरीर में बिगाड़ जाये तो कफ दोष सम्बन्धी रोग हो जाते हैं। आकाश तत्व का संतुलन बिगड़ जाये तो नाड़ियों में या रक्त वाहनियों में ब्लॉकेज आदि हो जाते हैं जैसे हृदयरोग आदि। पृथ्वी तत्व का संतुलन बिगड़ जाये तो हड्डियों, खून या चमड़ी सम्बन्धी रोग होते हैं और सम्बन्धो में बिगाड़ आता हैं।

इसी तरह से भवन के अंदर भी अगर यह तत्व असंतुलित हो जाये तो उस भवन से भी वहां रहने वालों को शुभ फल नहीं मिलते ।जैसे दक्षिण - पूर्व अग्नि तत्व का मंडल है पर अगर वहां बाथरूम बना दिया जाये तो अग्नि और जल तत्व बिगड़ जायेंगे और उस तत्व सम्बन्धी समस्याएं उस भवन में रहने वालों को आएँगी। इसलिए भवन में कौन कौन सी दिशा और मंडल किस तत्व के अधीन आतें हैं और उन्हें किस तकनीक से बिना तोड़ फोड़ किये संतुलित किया जाये।

 

मंडल वास्तु

पूरा ब्रह्माण्ड 360 डिग्री का है। भवन के अंदर भी उत्तर दिशा 0 डिग्री से दक्षिणावर्त घूमते हुए फिर उत्तर पर ही 360 डिग्री पर पूरा भ्रमण चक्र होता है। जैसे दिशाओं के अंदर मुख्या चार दिशाएं होती है। उसके और बारीकी में जाएँ तो 4 अन्य दिशाएं होती है । जिन्हे हम कोण के नाम से जानते हैं। पहले जब पुरे घर को 4 हिस्सों में बांटते है तो एक हिस्सा 90 डिग्री का आता है। उसके बाद उसे 8 हिस्सों में बांटते हैं तो एक हिस्सा 45 डिग्री का आता हैं। जैसे की कुंडली के फलित में ज़्यादा सटीकता लाने के लिए महादशा में अन्तर्दशा और अन्तर्दशा में प्रत्यंतर दशा देखते हैं, इसी प्रकार वास्तु शास्त्र में भी सटीकता ज़्यादा गहराई से देखने के लिए उन् 8 दिशाओं को आगे 16 हिस्सों में बाँट दिया जाता है। जिसका एक हिस्सा 22.50 डिग्री का आता है।

विश्कर्मा प्रकाश में ब्रह्माण्ड के इन् 16 हिस्सों को मंडल कहा जाता है। पर आजकल यह 16 ज़ोन्स के नाम से प्रचलित है। यह वैदिक वास्तु का ही एक महत्वपूर्ण अंग है। वास्तु शास्त्र में व्यक्ति की समस्या को सहसम्बन्धी करने के लिए और सही उपचार करने के लिए इन् मंडलों पर कार्य किया जाता है।

इसलिए वास्तु करते समय वैदिक वास्तु, दिशा वास्तु, बिडलिंग वास्तु, एनर्जी वस्तु, तत्त्वों और जीओपेथिक स्ट्रेस के साथ अच्छे रिजल्ट आते हैं ।

 

जीओपेथिक स्ट्रेस वास्तु

वास्तु करते समय आम तौर पर सभी द्रिश्य चीज़ों की ओर ही ध्यान दे पाते हैं। जैसे प्लाट का आकार क्या है, कोई कोना कटा या टेड़ा तो नहीं, ईमारत कैसी है, आकार कैसा है, कोई विरोशी रंग तो नहीं लगाया है, तत्त्व विरोधी तो नहीं है। पर अक्सर भूल हो जाती है कि हर कोई अद्रिश्य एनर्जी पर ध्यान नहीं देते । हम भवन पर आने वाले बाहरी प्रभाव भी देखते हैं, ग्रहों की शक्ति भी देखते हैं। पर बहुत काम लोग हैं जो कि पाताल कि ऊर्जा यानि जीओपेथिक स्ट्रेस को चैक कर पाते हैं। " हाथ न पहुंचे तो वह वस्तु कड़वी " प्रकृति वाले लोग जो इसे ढून्ढ नहीं पाते वो तो इसे नाकार ही देते हैं ।

पर यह धरती की कुदरती प्रक्रिया से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा है जो कि वैज्ञानिक आधारित है। धरती  के नीचे सतह का पानी धीरे धीरे काफी दूषित होता जा रहा है और धरती के नीचे की सतह की रासायनिक प्रक्रियाओं कि वजह से कुछ गैसें धरती के नीचे से ऊपर को आती हैं जो कि नंगी आँखों से नज़र नहीं आती। जिसे पाताल कि ऊर्जा या धरती के विकिरण भी कहा जाता है। पर इसका सामान्य नाम जीओपेथिक स्ट्रेस है ।

जिओ का मतलब है धरती, पेथिक का मतलब है रस्ते, स्ट्रेस का मतलब समस्या यानि धरती के रस्ते आने वाली समस्या। यह ऊर्जा मानव शरीर पर, पशु पक्षियों पर, संवेदनशील मशीनरी पर या भवनों के लिए काफी हानिकारक है।जो आज तक के शोध में पाया गया है कि यह मानसिक रोगों और शारीरिक रोगों को 80% तक बढ़ाने वाली होती है ।

अगर कोई व्यक्ति अनजाने में उस स्थान पर सोता हो जहाँ जीओपेथिक स्ट्रेस का केंद्र और त्रिज्या हो तो यह धीरे धीरे उस व्यक्ति का प्रतिरक्षा तंत्र कमज़ोर होने लगता है। पहले उसको ऊर्जा स्तर की बीमारी आती है रोग के प्रति टेस्ट भी करवा लिए जाएँ तो कई बार टेस्ट में भी कुछ नहीं आता। रोग बढ़ता जाता है पर दवाई भी नहीं लगती। इंसानी शरीर में 7 चक्र होते हैं। व्यक्ति का जो भी चक्र कमजोर हो तो पहले यह उस चक्र को ब्लॉक कर देती है फिर उस चक्र से सम्बंधित अंगों को नुक्सान पहुंचना शुरू कर देती है। अगर किसी को भी रोग कि ऐसी अवस्था नज़र आये चाहे वह मानसिक रोग हो या शारीरिक रोग तो अपने घर का  विश्लेषण जरूर करवाना चाहिए और अपने शरीर को भी चेक करवाना चाहिए क्यूंकि यह ऊर्जा बाकी द्रिश्य ऊर्जा से ज्यादा खतरनाक है। यह आप अपने नक़्शे या कमरे की फोटो से भी चेक करवा सकते हैं। अपने शरीर में भी चैक करवा सकते हैं और अपनी फोटो पर भी चेक करवा सकते हैं। यह आपके भवन में भी ठीक की जा सकती है । और आपके शरीर से भी उपचारात्मक  द्वारा ठीक की जा सकती है। जिस से आपका प्रतिरक्षा तंत्र ठीक होने लगता है, दवाई लगने लग जाती है और आप जल्द ही रोग मुक्त होना शुरू हो जाते हैं। इसको चैक करवाने में देरी नहीं करवानी चाहिए, जितनी ज्यादा देर शरीर में यह रहेगी उतनी ज़्यादा  तकलीफ बढ़ने लग जाती है। अगर एक बार किसी का अंग ख़राब हो जाए तो फिर उस को सुधारने में काफी समय लग सकता है । फिर अंग बदलने के इलावा कोई उपचार नहीं बचता। अगर जीओपेथिक स्ट्रेस पर मशीन रख दी जाये तो वह मशीन भी अक्सर खराब रहती है।

भवन की जिस दिशा में जीओपेथिक स्ट्रेस निकले तो उस दिशा के द्वारा या उस मंडल से सम्बंधित मिलने वाले फलों में कमी आ जाती है। जैसे मान लीजिये किसी भवन की दक्षिण - पश्चिम में यह निकल रही है तो उस भवन में रहने वालों को यह बड़ी बीमारी दे सकती है, उनके वहां पित्तृ दोष जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। आपसी सम्बन्ध भी बिगड़ जाते हैं। कई बार तो आपके बच्चों के रिश्ते ही सफल नहीं होते या शादियां टूट जाती है। इसी तरह अलग अलग दिशा में होने से उसके फल भी उसी दिशा अनुसार ख़राब होंगे।अगर किसी के बिस्तर के ऊपर या तकिये पर निकलती है तो उस को कोई मानसिक रोग, डिप्रेशन, चिंता, सर दर्द या आत्मघात विचार भी देती है। अगर बिस्तर के मध्य में निकले तो वहां पेट या पाचन शक्ति से सम्बंधित समस्या आ सकती है।इसलिए आज के युग में घरों को ठीक करना बहुत जरुरी है। अगर किसी के घर में भी रोग की शुरुआत है या कोई रोगी है तो इसकी जांच अवश्य करवानी चाहिए।

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